Tuesday, March 24, 2026

थोड़ा तेज चल ऐ ज़िंदगी, मंज़िल बहुत दूर है

थोड़ा तेज चल ऐ ज़िंदगी, मंज़िल बहुत दूर है,

दिल में दबे हुए सारे ख़्वाब आज भी मजबूर हैं।


चलते-चलते थक गया हूँ, साँसें भी अब चूर हैं,

मुस्कान झूठी हो गई, आँखों में दर्द भरपूर है।


रातों की नींद खो गई, दिन भी अब बेनूर है,

अपनों के बीच रहकर भी दिल कितना मजबूर है।


जिसे अपना समझा था, वही सबसे दूर है,

अब तो हर रिश्ता लगता जैसे कोई दस्तूर है।


टूट कर भी जी रहा हूँ, ये कैसा गुरूर है,

ज़ख्म छुपा के हँस रहा हूँ, यही मेरा कुसूर है।


No comments:

Post a Comment

Thanks for your comment.