Sharad Mishra

Monday, September 4, 2017

थोडा थक गया हूँ

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थोडा थक गया हूँ, दूर निकलना छोड दिया है। पर ऐसा नही है,की मैंने चलना छोड दिया है।।      फासले अक्सर रिश्तों में,      दूरी बढ़ा देते है...
Saturday, September 2, 2017

बचपन

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बचपन लौट के नही आता। जब भी ढूँढा यादों में पाता॥ बचपन के अजब रंग थे । दोस्त और मस्ती के संग थे॥ आम के पेड़ अमरूद की डाली । बेरों के कां...
Monday, August 21, 2017

पुराने शहरों के मंज़र

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पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं मैं खोलता हूँ सदफ़ मोतियों के चक्कर में मगर यहाँ भी समन्दर नि...
Sunday, August 20, 2017

सब दोस्त थकने लगे है.

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दोस्त अब थकने लगे है किसीका पेट निकल आया है, किसीके बाल पकने लगे है... सब पर भारी ज़िम्मेदारी है, सबको छोटी मोटी कोई बीमारी है। दिनभर ज...
Friday, August 18, 2017

पत्थरों के शहर में कच्चे मकान

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पत्थरों के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है… आजकल हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है.. अपने घर की कलह से फुरसत मिले तो सुने… आजकल पराई दीवार पर...
Tuesday, August 15, 2017

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद...
Sunday, October 23, 2016

Mitti wale diye jalana

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राष्ट्रीय हित का गाला घोंटकर छेद न करना थाली में, मिट्टी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में ! देश के धन को देश में रखना नहीं बहाना नाली में...
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