Wednesday, July 25, 2012

Dua ki baat karte ho .. .


दुआ की बात करते हो, यहाँ गाली नहीं मिलती
दो रूपये में चाय की प्याली नहीं मिलती

यहाँ जीना तो मुश्किल है मगर मरना मुसीबत है
सुना है अब तो कोई कब्र भी खाली नहीं मिलती

कहीं तो हर कदम पर सिर्फ़ सब्ज़ा ही नजर आए
कहीं सौ कोस चलने पर भी हरियाली नहीं मिलती

हमारे दौर के बच्चों ने सब कुछ देख डाला है
मदारी को तमाशों पर कोई ताली नहीं मिलती

सफेदी ओढ़ने का यह नतीजा है कि लोगों के
लहू में भी लहू जैसी कहीं लाली नहीं मिलती

गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, मौत, सब तो हैं
मगर सरकार का दावा है, बदहाली नहीं मिलती

Wednesday, July 18, 2012

Safar me mushkilen aaye to jurrat aur badhti hai


सफ़र मे मुश्किले आये तो जुर्रत्त और बढती है,
कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढती है!

बुझाने को हवा के साथ गर बारिश भी आ जाए,
चरागे बे हकीकत की हकीकत और बढती है! 

मेरी कमजोरियों पर जब कोई तनकीद करता है,
वो दुश्मन क्यों ना हो उससे महोब्बत और बढती है! 

अगर बिकने पे आजाओ तो घट जाते हैं दाम अक्सर,
ना बिकने का इरादा हो तो कीमत और बढती है!

Thursday, December 22, 2011

hamko mita sake ye zamane mein dam nahin



hamko mita sake ye zamane mein dam nahin
hamsein zamana khud hain zamane se ham nahin

befaayada aalam nahi bekaar gam nahin
taufeek de khuda to ye nemat bhi kam nahin

meri zuban pe shikva-e-ahal-e-sitam nahin
muzko jaga diya ye ahsaan kam nahin

yaa rab! hujuum-e-gam ko de kucch aur vuusatein
daaman to kya abhi meri aankhe bhi nam nahin

zaahid kucch aur ho na ho maikhane mein magar
kya kam ye hain ke shikva-e-dair-o-haram nahin

marg-e-jigar pe kyon teri aankhein hain ashk rez
ik saanihaa sahi magar itnaa aham nahiin

Wednesday, December 21, 2011

Tum To nahi ho




सुन ली जो ख़ुदा ने वो दुआ तुम तो नहीं हो

दरवाज़े पे दस्तक की सदा तुम तो नहीं हो


सिमटी हुई शर्माई हुई रात की रानी

सोई हुई कलियों की हया तुम तो नहीं हो


महसूस किया तुम को तो गीली हुई पलकें

भीगे हुये मौसम की अदा तुम तो नहीं हो


इन अजनबी राहों में नहीं कोई भी मेरा

किस ने मुझे यूँ अपना कहा तुम तो नहीं हो

Saturday, December 17, 2011

koi haseen khaab dhondhte hai


Dard bhari zindagi ka suraag dhondte hai



Hai andhera bhut yaha eak chiraag dhondte hai



Banaye thy tamasha zindagi ko es tarh



Ke un mherbaano ka elaaj dhondhte hai



Koi en andhero main meri dil ki shmma jala de



Hum apni badnasibi ka raaz dhnodhte hai



Hasrat ka aayina ye pather dil se toot gaya



Sisho ke en tokdo main apna aaj dhondhte hai



Maazi ke tulkh lamho ne hame jhulas ke rakh diya


Dil ko bhulane ke liye koi haseen khaab dhondhte hai

Monday, December 12, 2011

Yaar, Hum Bade Ho Jaate hai


Aankhon mein Khwaab!!
Chehre Par Muskaan!!
Dil mein Khwaishe..
Bade Hone Ke Armaan

Chalte Chalte Yeh Daur
Kaha Kho Jaate hai
Pata Nahi Kyon,
Yaar,Hum Bade Ho Jaate Hai..!!

Ek Halki Si Muskaan Chehre Par
Aaj Bhi Sajaye Baithe Hai!!
Kal Ki Fikar mein Hum,
Apna Aaj Gawaye baithe Hai

Waqt Aur Halaat Ke Mutabik
Hum  To Sawar Jaate Hai
Par Pata Nahi Kyon,
yaar, Bade Ho jaate Hai

Zimmedariyan Bhi
Badhti Reh Gayi
Umar Ke Mutabik Sehat
Ghathti Reh gayi

Masoom Se Khwaab
Palkon mein So Jate Hai
Pata Nahi Kyon
Yaar, Bade Ho Jaate Hai

Khel Bhaag Daud Ke
Ab Zaroorate Khilaati hai
Paise,Status Ke peeche
Har Ek Ko Bhagaati Hai

Aage Bhadne Ki Daud mein Hum Rishto
Ko Peeche Chodd jaate Hai
Pata Nahi Kyon,
Yaar, Hum Bade Ho Jaate Hai

Ruthna-Manana Guzra
Hua Daur Sa Lagta Hai!!
Aaj ka Aadmi Shikayaton
Ko Mann mein Bharta Hai

Hum Apno Se Pal Bhar Mein
Door Ho Jaate hai
Pata Nahi Kyon,
Yaar, Hum Bade Ho Jaate hai

"Khwaish" Apne Dil Ke Dhadkano Ki Suun
yeh Bhi Kuch keh jaate hai!!
Awaaz nahi inme par Yeh Har
Zakhm Duniya ke Seh Jaate Hai

Khilone Toote To Juud Jaaye!!!!!
Dil Toote To Hum Ro Jaate Hai
Pata Nahi Kyon,
Yaar, Hum Bade Ho Jaate Hai

Kafan faad kar murda bola


चमड़ी मिली खुदा के घर से
दमड़ी नहीं समाज दे सका
गजभर भी न वसन ढँकने को
निर्दय उभरी लाज दे सका


मुखड़ा सटक गया घुटनों में
अटक कंठ में प्राण रह गये
सिकुड़ गया तन जैसे मन में
सिकुड़े सब अरमान रह गये


मिली आग लेकिन न भाग्य-सा
जलने को जुट पाया इंधन
दाँतों के मिस प्रकट हो गया
मेरा कठिन शिशिर का क्रन्दन


किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया


श्वेत माँग-सी विधवा की,
चदरी कोई इन्सान दे गया
और दूसरा बिन माँगे ही
ढेर लकड़ियाँ दान दे गया


वस्त्र मिल गया, ठंड मिट गयी,
धन्य हुआ मानव का चोला
कफन फाड़कर मुर्दा बोला ।


कहते मरे रहीम न लेकिन,
पेट-पीठ मिल एक हो सके
नहीं अश्रु से आज तलक हम,
अमिट क्षुधा का दाग धो सके


खाने को कुछ मिला नहीं सो,
खाने को ग़म मिले हज़ारों
श्री-सम्पन्न नगर ग्रामों में
भूखे-बेदम मिले हज़ारों


दाने-दाने पर पाने वाले
का सुनता नाम लिखा है
किन्तु देखता हूँ इन पर,
ऊँचा से ऊँचा दाम लिखा है


दास मलूका से पूछो क्या,
'सबके दाता राम' लिखा है?
या कि गरीबों की खातिर,
भूखों मरना अंजाम लिखा है?


किन्तु अचानक लगा कि यह,
संसार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी
मरने पर उपकार हो गया ।


जुटा-जुटा कर रेजगारियाँ,
भोज मनाने बन्धु चल पड़े
जहाँ न कल थी बूँद दीखती,
वहाँ उमड़ते सिन्धु चल पड़े


निर्धन के घर हाथ सुखाते,
नहीं किसी का अन्तर डोला
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला ।


घरवालों से, आस-पास से,
मैंने केवल दो कण माँगा
किन्तु मिला कुछ नहीं और
मैं बे-पानी ही मरा अभागा


जीते-जी तो नल के जल से,
भी अभिषेक किया न किसी ने
रहा अपेक्षित, सदा निरादृत
कुछ भी ध्यान दिया न किसी ने


बाप तरसता रहा कि बेटा,
श्रद्धा से दो घूँट पिला दे
स्नेह-लता जो सूख रही है
ज़रा प्यार से उसे जिला दे


कहाँ श्रवण? युग के दशरथ ने,
एक-एक को मार गिराया
मन-मृग भोला रहा भटकता,
निकली सब कुछ लू की माया


किन्तु अचानक लगा कि यह,
घर-बार बड़ा दिलदार हो गया
जीने पर दुत्कार मिली थी,
मरने पर उपकार हो गया


आश्चर्य वे बेटे देते,
पूर्व-पुरूष को नियमित तर्पण
नमक-तेल रोटी क्या देना,
कर न सके जो आत्म-समर्पण !


जाऊँ कहाँ, न जगह नरक में,
और स्वर्ग के द्वार न खोला !
कफ़न फाड़कर मुर्दा बोला ।