Tuesday, March 24, 2026

थोड़ा तेज चल ऐ ज़िंदगी, मंज़िल बहुत दूर है

थोड़ा तेज चल ऐ ज़िंदगी, मंज़िल बहुत दूर है,

दिल में दबे हुए सारे ख़्वाब आज भी मजबूर हैं।


चलते-चलते थक गया हूँ, साँसें भी अब चूर हैं,

मुस्कान झूठी हो गई, आँखों में दर्द भरपूर है।


रातों की नींद खो गई, दिन भी अब बेनूर है,

अपनों के बीच रहकर भी दिल कितना मजबूर है।


जिसे अपना समझा था, वही सबसे दूर है,

अब तो हर रिश्ता लगता जैसे कोई दस्तूर है।


टूट कर भी जी रहा हूँ, ये कैसा गुरूर है,

ज़ख्म छुपा के हँस रहा हूँ, यही मेरा कुसूर है।


हमारा हुआ करता था

जो सबसे प्यारा हुआ करता था

आंखों का तारा हुआ करता था

चंद रोज नाराज क्या हुए

वो अब कहते हैं कि "हमारा हुआ करता था"

Friday, October 24, 2025

जिंदगी अच्छी थी... बस

 ज़िंदगी अच्छी थी, मगर कहानी अधूरी रही,  

हर खुशी के बाद बस, तन्हाई ज़रूरी रही।


किस्मत ने छीनी नहीं, बस धीरे से बदल दी,  

जिस मकाँ की तलाश थी हमें, वो यादों में रही।



Tuesday, February 18, 2020

मैं खफा हूँ पर चाहता हूँ वो मुझसे बात करे
मैं जुदा हूँ पर चाहता हूँ वो मेरे करीब रहे
मैं लाख गलत हूँ पर चाहता हूँ वो सही रहे
मैं चुप हूँ पर चाहता हूँ वो सदा बोलती रहे
जो दिल मे रहते थे वो दिमागों में भी नहीं जो निगाहों में रहते थे वो यादों में भी नहीं जो बातों में रहते थे वो अब वादों में भी नहीं जो आहों में रहते थे वो फरियादों में भी नहीं

Thursday, May 17, 2018

ज़िंदगी

ज़िन्दगी से लम्हे चुरा, बटुए मे रखता रहा!
फुरसत से खरचूंगा, बस यही सोचता रहा।

उधड़ती रही जेब, करता रहा तुरपाई
फिसलती रही खुशियाँ, करता रहा भरपाई।

इक दिन फुरसत पायी, सोचा .......खुद को आज रिझाऊं
बरसों से जो जोड़े, वो लम्हे खर्च आऊं।

खोला बटुआ..लम्हे न थे, जाने कहाँ रीत गए!
मैंने तो खर्चे नही, जाने कैसे बीत गए !!

फुरसत मिली थी सोचा, खुद से ही मिल आऊं।
आईने में देखा जो, पहचान  ही न पाऊँ।

ध्यान से देखा बालों पे, चांदी सा चढ़ा था।
था तो मुझ जैसा, जाने कौन खड़ा था।

Monday, April 9, 2018

हिदी शायरी

हम लोग भी कितने अजीब है...
निशानियाँ तो महफूज रखते है और लोगों को खो देते है।

वो दुश्मन बनकर मुझे जीतने निकले थे,
दोस्ती कर लेते तो मैं खुद ही हार जाता🙏🙏

Sunday, April 1, 2018

अकेले है वो...

अकेले हैं वो और झुँझला रहे हैं
मिरी याद से जंग फ़रमा रहे हैं

ये कैसी हवा-ए-तरक़्क़ी चली है
दिए तो दिए दिल बुझे जा रहे हैं

Saturday, March 17, 2018

काश...

मैं उस समय मे वापस जाना चाहता हूँ....

👉जहां ड्रिंक का मतलब सिर्फ "रसना" था
👉जहाँ सिर्फ "पापा" हीरो थे, अमिताभ नही
👉जहाँ माँ का प्यार ही असली प्यार होता था
👉जहाँ सबसे बड़ी दुश्मन मेरी बहन होती थी
👉जहाँ सबसे ऊंची जगह मेरे पापा के कंधे थे
👉जहाँ सिर्फ खिलौने टूटते थे कभी दिल नहीं

Friday, March 16, 2018

मेरी सोच...

जहां कदर नहीं वहां जाना नहीं।
जो पचता नहीं, वो खाना नहीं।
जो सत्य पर रूठे उसे, मनाना नहीं
जो नज़रों से गिरे, उसे उठाना नहीं।
मौसम सा जो बदले, दोस्त बनाना नहीं।
ये तकलीफें तो जिंदगी का हिस्सा है
डटे रहना पर कभी घबराना नही।🙏🙏

Saturday, February 17, 2018

ख्वाब

दुनिया इक परिवार बताया जाता है।
अक्सर इन्सां तनहा पाया जाता है।

रब्तो-रक़ाबत दुनियादारी रँगरलियां,
लेकिन अपना साथ न साया जाता है।

आँखों देखी पर भी यकीं करना मुश्किल,
ज़हर शिफ़ा के तौर दिखाया जाता है।

हर आवाज़ तवज्जो लायक़ क्यूँ समझूँ,
बे मक़सद भी शोर मचाया जाता है।

माज़ी से दौरे हाज़िर दस्तूर यही,
नाहक़ ही मज़लूम सताया जाता है।

अब तक मैंने इतना ही जाना सीखा,
ख़ुशियाँ बाँटी दर्द छुपाया जाता है।

इश्क़ हमेशा देता आँसू दर्दो-ग़म,
आख़िर क्यूँ ये ख़ाब सजाया जाता है।

सोचा ना था...

बोतल मे रखी शराब सुख जाएगी, सोच ना था.
पर बोतल से बदबू नही जाएगी ,सोचा ना था।
पैरो मे पड़े छाले सूख जाएगा , सोच ना था।
पर निशान नही जाएगा, सोचा ना था।
पहले प्यार के निशान मिट जाएगा सोचा ना था।
पर उसमे जो हाथ जले थे उसके निशान नही जाएँगे, सोचा ना था।
महफ़िल मे रहने वाले भी तनहा हो जाएगा, सोचा ना था।
ओर उन तन्हाइयो की आदत मे पड जाएँगे , सोचा ना था।
अब सोचता हू क्या खोया ओर क्या पाया...तो लगता है,
खोने को कुछ था ही नही ओर पाने के लिये है
सारा आसमान!!!

Thursday, November 9, 2017

हम भारत एक बनायेगे

तुम जितना कीचड़ डालोगे हम उतने कमल खिलाएंगे। तुम जाती विभाजन में लगे रहो, हम भारत एक बनायेंगे।।

तुम घोटालों के बादशाह, हम भारत स्वच्छ बनाएंगे। तुम ग़ुलामी के आदी हो, हम नई विचारधारा लाएंगे।।

तुम अकबर की करो इबादत, हम अशोक महान बताएंगे।
तुम वामियों द्वारा लिखित इतिहास मे क्या ख़ाक देशभक्ति पाओगे।।

तुम बाबर के घोर प्रशंसक,हम भीम पार्थ के अनुगामी। तुम लूटमार में सिद्धहस्त,हम पृथ्वी से जीवनदानी।।

हम वीर शिवा के वंशज है,तुम अफजल वाली धुरी हो। हम मातृभुमि पर शीश चढाते ,तुम कपट बगल की छूरी हो।।

तुम गद्दारो के हाथो बिक देश की बली चढाओगे।
हम अमरसिंह के अनुगामी से अपना शीश कटवाओगे।।

तुम नफरत के बीज बिखेरोगे हम प्रेम की फसल उगायेंगे।
गद्दारो के फन कुचलकर हम देश का कर्ज चुकायेंगे।।

तुम टीपू की महिमा गाते, महिषासुर जयंती मनाते हो। हम बोस आज़ाद की कुर्बानी जन गण मन पहुंचाएंगे।।

तुम जितनी चाहे साजिश रच लो हम जीत का विगुल बजायेंगे।
कश्मीर से लेकर केरल तक हम भारत एक बनायेंगे।।

तुम जाति धर्म में बांटे हमको, पर हम एक थाली में खाएंगे।
हिन्दू हो या हो मुस्लिम,  हम भारत एक बनायेंगे।।

देश पर आती आंच को हम सीने से लगाएंगे।
नहीं बटेंगे टुकड़ों में खुद मिटना पड़े चाहे देश की खातिर हँसकर मिट जाएंगे।।

तुम देश मे दंगे करते हो, हम अमन की गंगा बहाएंगे । तुम लाल हरे रंग में बांटोगे, हम मिलकर तिरंगा लहरायेंगे ।।

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शुद्र सब छोड़ देश को जाएँगे। आर्यवृत्त की गरिमा को हम अम्बर तक ले जाएंगे।।

आचार्य चाणक्य के सपने को मोदी से पूर्ण कराएंगे। खुद भी एक रहेंगे और  हम भारत एक बनायेंगे।।

तुम तिरंगे का करो अपमान, हम खड़े होकर राष्ट्रगान गाएंगे।
लाख जतन कर लो खंडन की, हम भारत एक बनायेंगे।।

तुम अन्धकार के पोषक हो, हम सूरज ही ले आयेंगे। कतरा कतरा लहू जोड़, हम भारत एक बनायेगे।।

आओ एक प्रण करते कि हम भारत एक बनायेगे

Monday, September 4, 2017

थोडा थक गया हूँ

थोडा थक गया हूँ,
दूर निकलना छोड दिया है।
पर ऐसा नही है,की मैंने
चलना छोड दिया है।।

     फासले अक्सर रिश्तों में,
     दूरी बढ़ा देते हैं।
     पर ऐसा नही है कि मैने अपनों
     से मिलना छोड दिया है।।

हाँ...ज़रा अकेला हूँ दुनिया
की भीड में।
पर ऐसा नही की मैने
अपनापन छोड दिया है।।

    याद करता हूँ अपनों की
    परवाह भी है मन में।
    बस कितना करता हूँ ये
    बताना छोड दिया।।
         

Saturday, September 2, 2017

बचपन

बचपन लौट के नही आता।
जब भी ढूँढा यादों में पाता॥

बचपन के अजब रंग थे ।
दोस्त और मस्ती के संग थे॥

आम के पेड़ अमरूद की डाली ।
बेरों के कांटे मकड़ी की जाली॥

पापा की डांट मम्मी का प्यार।
छोटा सा बछड़ा था अपना यार॥

बारिश का पानी डूबे कीचड़ में पाँव।
बारिश के पानी में कागज की नाव।।

गुल्ली व डंडो का प्यारा सा खेल।
चोर सिपाही में होती थी जेल॥

बचपन लौट के नही आता।
जब भी ढूँढा यादों में पाता॥

Monday, August 21, 2017

पुराने शहरों के मंज़र

पुराने शहरों के मंज़र निकलने लगते हैं
ज़मीं जहाँ भी खुले घर निकलने लगते हैं

मैं खोलता हूँ सदफ़ मोतियों के चक्कर में
मगर यहाँ भी समन्दर निकलने लगते हैं

हसीन लगते हैं जाड़ों में सुबह के मंज़र
सितारे धूप पहनकर निकलने लगते हैं

बुरे दिनों से बचाना मुझे मेरे मौला
क़रीबी दोस्त भी बचकर निकलने लगते हैं

बुलन्दियों का तसव्वुर भी ख़ूब होता है
कभी कभी तो मेरे पर निकलने लगते हैं

अगर ख़्याल भी आए कि तुझको ख़त लिक्खूँ
तो घोंसलों से कबूतर निकलने लगते हैं

Sunday, August 20, 2017

सब दोस्त थकने लगे है.

दोस्त अब थकने लगे है

किसीका पेट निकल आया है,
किसीके बाल पकने लगे है...

सब पर भारी ज़िम्मेदारी है,
सबको छोटी मोटी कोई बीमारी है।

दिनभर जो भागते दौड़ते थे,
वो अब चलते चलते भी रुकने लगे है।

पर ये हकीकत है,
सब दोस्त थकने लगे है...1

किसी को लोन की फ़िक्र है,
कहीं हेल्थ टेस्ट का ज़िक्र है।

फुर्सत की सब को कमी है,
आँखों में अजीब सी नमीं है।

कल जो प्यार के ख़त लिखते थे,
आज बीमे के फार्म भरने में लगे है।

पर ये हकीकत है
सब दोस्त थकने लगे है....2

देख कर पुरानी तस्वीरें,
आज जी भर आता है।

क्या अजीब शै है ये वक़्त भी,
किस तरहा ये गुज़र जाता है।

कल का जवान दोस्त मेरा,
आज अधेड़ नज़र आता है...

ख़्वाब सजाते थे जो कभी ,
आज गुज़रे दिनों में खोने लगे है।

पर ये हकीकत है
सब दोस्त थकने लगे है...

Friday, August 18, 2017

पत्थरों के शहर में कच्चे मकान

पत्थरों के शहर में कच्चे मकान कौन रखता है…
आजकल हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है..

अपने घर की कलह से फुरसत मिले तो सुने…
आजकल पराई दीवार पर कान कौन रखता है..

खुद ही पंख लगाकर उड़ा देते हैं चिड़ियों को..
आज कल परिंदों मे जान कौन रखता है..

हर चीज मुहैया है मेरे शहर में किश्तों पर..
आज कल हसरतों पर लगाम कौन रखता है..

बहलाकर छोड़ आते है वृद्धाश्रम में मां_बाप को…
आज कल घर में पुराना सामान कौन रखता है…

सबको दिखता है दूसरों में इक बेईमान इंसान…
खुद के भीतर मगर अब ईमान कौन रखता है…

फिजूल बातों पे सभी करते हैं वाह-वाह..
अच्छी बातों के लिये अब जुबान कौन रखता है...!!✍

Tuesday, August 15, 2017

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।।

Sunday, October 23, 2016

Mitti wale diye jalana

राष्ट्रीय हित का गाला घोंटकर छेद न करना थाली में,
मिट्टी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में !

देश के धन को देश में रखना नहीं बहाना नाली में,
मिट्टी वाले दिए जलना अबकी बार दिवाली में !

बने जो अपनी मिट्टी से वो दिए बिके बाज़ारो में,
छुपी है वैज्ञानिकता अपने सभी तीज-त्योहारो में !

"चाइनीज़ झालर" से आकर्षित कीट पतंगे आते है,
जबकि दिए में जलकर बरसाती कीड़े मर जाते है !

कार्तिक दीपदान से बदले पितृदोष खुशहाली में,
मिट्टी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में !

कार्तिक की अमावस वाली रात न अबकी काली हो,
दिए बनाने वालो के भी खुशियो भरी दिवाली हो !

अपने देश का पैसा जाए अपने भाई की झोली में,
गया जो दुश्मन देश में पैसा लगेगा राइफल गोली में !

देश की सीमा रहे सुरक्षित चूक न हो रखवाली में,
मिट्टी वाले दिए जलाना अबकी बार दिवाली में !!